ंगठनात्मक इतिहास


आरंभ       

केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला, पुणे, जिसकी स्थापना 1916 में बंबई प्रेसीडेंसी (राष्ट्रपतित्व) की एक विशेष सिंचाई विभाग के रूप में हुई । आज यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की एक प्रतिष्ठा प्राप्त संस्था है । इस संस्था की शुरूआत हडपसर, पुणे, में हुई जो खड़कवासला बाँध द्वारा निर्मित लेक फिफे जलाशय से बने मुठा नदी के दाहिनी नहर के तट पर बसा था ।

इस सदी के प्रारंभ में, उस वक्त के बंबई प्रांत को सिंचाई से संबंधित विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ा, जैसे उत्तर में सिंध की जलोढ़ नदियों से लेकर दक्खन पठार की बेसाल्ट विघटित काली मिट्टी तक। सिंचाई नहर प्रणाली का उत्तर भारतीय अनुभव जब दक्षिण क्षेत्र में प्रयोग में लाने का प्रयास किया गया, तब इन दोनों क्षेत्रों में उगाई जानेवाली फ़सलों तथा इन दोनों क्षेत्रों में होने वाली वर्षा में अंतर के कारण इसमें बड़ी कठिनाई महसूस हुई । दक्खन पठार पर सिंचाई की शुरूआत से इस क्षेत्र में जलाक्रमण तथा सोडियम फूलने के चलते जमीन गुणता में हृास हुआ । इस संस्था ने 1919 में पहली द्रवगति विज्ञान की समस्या हाथ में ली जब यह देखा गया कि दक्षिणी भारत के नहरों को वर्ष भर में अलग निस्सरण करने पड़ते हैं । जबकि उत्तरी भारत के सिंचाई नहर पूरे वर्ष भरे रहते हैं इसलिए इन्हें प्रयोग में लाने के उपाय भी अलग थे । 

जलीय प्रतिमान की मदद से किए गए शुुरूवाती परीक्षण में नदी तथा नहर द्रवगतिक अध्ययन का आरंभ हुआ जो 1928 तक इस संस्था की मुख्य गतिविधि बनी । प्रथम विश्व युद्ध  के पश्चात सुक्कुर बराज (सिंधु) के गाद उपवर्जन और हार्डिंग (गंगा) पर पुलों का संरक्षण तथा कोलाघाट (स्पनरैन) पर किए गए अध्ययनों से जलोढ़ नदियों की चल प्रवृत्ति और संरक्षण एवं सरलीकरण उपायों के निर्धारण से द्रवगतिक अनुसंधान केन्द्र का महत्त्व सिद्ध हुआ ।

शुरू में ही संस्था के प्राधिकारियों ने जान लिया था कि संस्था में सफल अनुसंधान गतिविधियों के लिए मूल अनुसंधान कार्य अनिवार्य है । 1935 तक अनुसंधान गतिविधियों में काफी मात्रा में बढ़ोत्तरी हुई जिससे हड़पसर में उपलब्ध आधारिक संरचनाएँ कम पड़ने लगी। बहुत-सा अनुसंधान कार्य/प्रतिमान अध्ययनों को पुणे शहर के दक्षिण-पश्चिम में लगभग 15 कि.मी. की दूरी पर स्थित खडकवासला में स्थानांतरित किया गया । यहाँ जलीय प्रतिमान अध्ययनों के लिए वर्ष भर समुचित मात्रा में जल उपलब्ध था । प्रारंभ में खड़कवासला की जलीय प्रयोगशाला खड़कवासला बाँध के निकट 14 हेक्टर क्षेत्र में बसी थी ।

2. संस्था का विस्तार

2.1 स्वतंत्रता पूर्व काल

तकनीकी तथा अनुसंधान कार्यो के लिए समन्वय निकाय के रूप में भारत सरकार ने प्रांतीय सरकारों के परामर्श से 1928 में केन्द्रीय सिंचाई मंडल की स्थापना की । कुछ प्रांतों में जलीय अनुसंधान प्रयोगशालाओं का निर्माण किया गया। पूरे भारत वर्ष के लिए एक केन्द्रीय सरकारी संस्था की आवश्यकता को महसूस किया गया जिसमें सुविधाओं को उन्नत किया जा सके जो केवल सिंचाई विभागों को ही नहीं, बल्कि रेल बोर्ड, पत्तन प्राधिकारी तथा अन्य सरकारी एजेंसियों को द्रवगतिक विज्ञान के क्षेत्र में सलाह दे सकें । भारत सरकार ने केन्द्रीय अनुसंधान शाला को पूना में स्थापित करने का निर्णय लिया । परिणाम स्वरूप 1928 में इस संस्था का नाम "द्रवगतिक विज्ञान अनुसंधान शाला" रखा गया जिसे 1937 में "केन्द्रीय सिंचाई तथा द्रवगतिक विज्ञान अनुसंधान शाला" कहा जाने लगा । 1944 में इस संस्था का  "भारतीय जलमार्ग प्रयोग केन्द्र" नामकरण किया गया जो इस युग में देश की बदलती अनुसंधान की ज़रूरतों को पूरी करने के लिए इस संस्था के कार्यक्षेत्र में हुआ बदलाव दर्शाती है ।

2.2 स्वतंत्रता पश्चात काल

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हुए बहुमुखी विकास के लिए "नदी घाटी विकास" यह सूचक शब्द बन गया । इसमें समुद्री संचार, नए पत्तनों का निर्माण एवं मौजूदा पत्तनों का सुधार और तट संरक्षण पर बल दिया गया । इन नई गतिविधियों एवं कार्य को दर्शाने के लिए सन 1947 में संस्था का नामकरण "केन्द्रीय जलमार्ग, सिंचाई और जहाजरानी अनुसंधान केन्द्र" रखा गया । इसके अलावा, मई 1947 में कार्यान्वित की गई पुनर्गठन योजना के अधीन नदी तथा नहर, जल विज्ञान, गणित, सांख्यिकी, मृदा एवं मृदा अभियांत्रिकी, कंक्रीट एवं निर्माण सामग्री, भौतिकी तथा रसायन इन प्रयोगशालाओं को इसमें जोड़ दिया गया । अनुसंधान शाला की गतिविधियों में हुई वृद्धि को प्रतिबिंबित करने के लिए 1949 में इसका नाम "केन्द्रीय जल विद्युत, सिंचाई तथा नौपरिवहन अनुसंधान शाला" रखा गया और बाद में 1951 में इसे "केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला" कहा जाने लगा जो आज भी प्रचलित है ।

केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला की संवृद्धि तथा विकास, राष्ट्र के जल और ऊर्जा संसाधन  विकास तथा जल वाहन परिवहन के विकास के साथ जुड़ा है । स्वतंत्रता के पश्चात सिंचाई तथा जल विद्युत विकास कार्य की बड़ी परियोजनाओं को हाथ में लिया गया । बाँधों, उत्प्लव मार्ग, द्वारों एवं वाल्व के लिए किफ़ायती और कोटरन मुक्त जलीय मशीनों का अभिकल्प करना अत्यंत जरूरी बन गया । अनुसंधान शाला में अत्याधुनिक बहु-परीक्षण जल सुरंंग के साथ स्थापित "कोटरन अनुसंधान केन्द्र" ने भारत में जलीय अनुसंधान के क्षेत्र में नई दिशा खोली । अनुसंंधान शाला ने नदी घाटी परियोजनाओं के जलीय तथा संरचनात्मक अभिकल्प से संबंधित अध्ययनों में उल्लेखनीय विशेषज्ञता हासिल की है । यह कहना संगत होगा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जो अध्ययन विकसित विदेशी प्रयोगशालाओं को सौंपे जाते थे, वे अब इस अनुसंधान शाला में किए जाने लगे । इसमें अन्य देशों से प्राप्त अध्ययन संदर्भ भी शामिल हैं । अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में, विशेष रूप से थोक मालों में, तेजी से हो रहे विस्तार के कारण 1960 में देश भर में पत्तन तथा बंदरगाहों का विकास करना पड़ा। अत: यह स्वाभाविक था कि केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला को इस क्षेत्र में भी अपनी   विशेषज्ञता का योगदान देने के लिए कहा जाए । हुगली, कांडला तथा कोचीन बंदरगाहों के प्रतिमानों से आरंभ करके देश की सभी प्रमुख पत्तनों विशेष रूप से मध्यवर्ती और मत्स्य  बंदरगाहों, के विकास से केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला का नज़दीकी संबंध रहा । इस संस्था ने 20 वर्ष के करार से, 55 जलीय प्रतिमान अध्ययनों द्वारा, सिंगापुर बंदरगाह के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है ।

देश के निरंतर औद्योगीकरण के चलते, 1970 में देश को बिजली के संकट का सामना करना पड़ा जिससे बिजली उत्पादन को बढ़ाने की आवश्यकता पड़ी । यद्यपि भारत के पास बड़ी मात्रा में जलीय क्षमता उपलब्ध होने पर भी पर्यावरण पहलू तथा जलीय विद्युत परियोजनाओं को लगनेवाली लंबी अवधि आदि कारणों से देश में उपलब्ध सभी संसाधनों को परखना संभव नहीं हुआ । इसमें स्वाभाविक रूप से तापीय ऊर्जा पर बल देना पड़ा, जिसमें अंतरग्र्राही पर शीतलन जल के पुन:-परिचालन की रोेकथाम के लिए तापीय विर्सजन और स्थिरीकरण केे जटिल अध्ययन हाथ में लेने पडे़। ज्वारीय अवस्था, समापन पद्धतियाँ, भू-तकनीकी और भू-भौतिकी पहलू, स्थल विशिष्ट भूकंपनीयता अभिकल्प, द्रवीकरण सक्षमता और एकीकृत पद्धति से पर्यावरणीय प्रभाव निर्धारित करने हेतु जलीय अन्वेषणों के क्षेत्रों मंे उसके बहुआयामी कौशल के उपयोग से कच्छ की खाड़ी मे एक ज्वारीय विद्युत उत्पादन केन्द्र के अभिकल्प हेतु भी केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला ने केन्द्रीय बिजली प्राधिकरण को पूरा अभियांत्रिकी बैक-अप उपलब्ध कराया ।

औद्योगिक और आर्थिक उन्नति का एक परिणाम यह है कि वायु, जल और भूमि के प्रदूषण स्तर में वृद्धि हुई है। अनेकों अभिकरण द्वारा प्रदूषक तत्त्वों के फैलाव संबंधी अध्ययन केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला को सौंपे गए । इन प्रदूषक तत्वों का फैलाव द्रव बल विज्ञान नियमों के अनुसार होता है। आगे, असाधारण स्थल विशिष्ट अवस्थाएँ, अभिकल्प धारणा में बदलाव, पड़ोसी जलविद्युत परियोजनाओं की वाहक प्रणालियों की एकीकृत जरूरत और ऐसे ही अन्य कारणों से त्रिमितीय प्रकाश प्रत्यास्थता तकनीक अपनाते हुए ऐसी समस्याओं को सुलझाने हेतु संरचनात्मक प्रतिमान निर्माण की जरूरत पड़ी । परिमित तत्त्व पद्धति अपनाते हुए गणितीय प्रतिमानन तकनीक के कारण गत्यात्मक अवस्थाओं के अधीन बल वितरण का सही निर्धारण संभव हुआ है ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सामूहिक प्रयासों के फलस्वरूप सिंचाई और जलविद्युत आवश्यकताओं के लिए जल संसाधनों का समुचित उपयोग हो इसलिए बाँध तथा अन्य जलीय संरचनाओं के लिए उपयुक्त स्थल पहले ही उपयोग में लाए गए हैं । अत: अधिक जटिल परियोजना स्थलों द्वारा उत्पन्न समस्याओं को सुलझाने में अधिक से अधिक अन्वेषण करने जरूरी थे । कंपनों और भूकंपों के कारण बलों द्वारा उत्पन्न दबाब हेतु संरचनाओं का अभिकल्प पर्याप्त है यह भी सुनिश्चित करने की जरूरत थी। ऐसे दबाबों से मौजूदा संरचनाओं को प्रतिबलित करने के लिए तकनीक का भी विकास किया गया । जल भू-विज्ञान, अन्वेषक जल विज्ञान, कंपन प्रौद्योगिकी, भूकंप इंजीनियरी और भू-भौतिकी जैसे अन्वेषण के नए क्षेत्र में केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला ने काम करना शुरू किया ।

केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला की गतिविधियों में विविधता आने के साथ, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्राप्त सहायता से प्रतिमानों पर परिष्कृत मापनों की सुविधाओं को उन्नत किया गया । जलीय प्रतिमानों में अनेक स्थानों पर एक साथ अनगिनत प्राचलों के मापन की आवश्यकता पूरी करने के लिए विश्लेषण और नियंत्रण प्रणाली, वास्तविक समय आँकड़ा अर्जन विकास और सूक्ष्मता बढ़ाने पर ज़्यादा बल दिया गया ।

डिजिटल संगणकों का युग आरंभ होने पर जलीय अनुसंधान के क्षेत्र में गणितीय प्रतिमानन तकनीक ने नए क्षेत्र खोल दिए । बृहत और शीघ्रगतिक संगणकों के आगमन पर अधिक से अधिक जटिलता वाली समस्याएँ सुलझाने में गणितीय प्रतिमानन एक सक्षम साधन बन गया है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम UNDP की सहायता से, नदी आकारिकी, तरंग और ज्वार, पर्यावरणीय जल विज्ञान, बाँध, संरुग, भूमिगत ओपनिंग आदि की संरचना और अभिकल्प आदि क्षेत्रों में अनुप्रयुक्ति सॉफ्टवेयर और स्टेट-ऑफ-द-आर्ट कंप्यूटरों के साथ एक साधन संपन्न परिपूर्ण केन्द्र स्थापित किया गया था ।

2.3 बहुआयामी सुविधाएँ 

            देश में जल संसाधन की जटिल समस्याओं को हल करने में सुविधा हो इसलिए स्टेट-ऑफ-द-आर्ट प्रौद्योगिकी केन्द्र का विकास करना केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य रहा है । इस दिशा में, निम्नांकित अध्ययन क्षेत्रों में केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला में प्रयोगशालाओं की स्थापना की गई है :

  • नदी इंजीनियरी

  • जल विज्ञान और जल संसाधन विश्लेषण

  • तटीय और तटदूर इंजीनियरी

  • द्रव चलित मशीनें

  • स्तरीकृत प्रवाह

  • भू-विज्ञान

  • बुनियादे तथा संरचनाएँ

  • गणितीय प्रतिमानन

  • यंत्रीकरण तथा नियंत्रण इंजीनियरी

2.4 उद्देश्य :  

1990 में शासी परिषद द्वारा संस्था के औपचारिक उद्देश्य का मसौदा बनाने तक आरंभिक वर्षो में, देश में जल संसाधन क्षेत्र की अनुप्रयुक्त अनुसंधान आवश्यकताएँ और मूलभूत अनुसंधान कार्य संचालित करना केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला का अलिखित उद्देश्य रहा है । जल की उत्पत्ति से उसके समुद्र में मिलने तक के समूचे जीवन चक्र को ध्यान में लेकर मौलिक और अनुप्रयुक्त अनुसंधान तथा सलाहकारी सेवाएँ देने के अलावा अनुसंधान कर्मियों का प्रशिक्षण और जल संसाधनों से जुड़ी अन्य संस्थाओं और राज्यों में अनुसंधान गतिविधियों में सहायता और आयोजन, मुख्यत: जल संसाधन में तकनीकी डाटा बेस का निर्माण एवं अनुसंधान निष्कर्षोे को प्रसारित करते हुए उसकी गतिविधियों से क्षेत्र का दायरा बढ़ाने के  लिए  केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला से अनुरोध किया जाता रहा है ।

केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला के  प्रमुख कार्यों में निम्नलिखित कार्य सम्मिलित है  :

  • योजना की रूपरेखा, संगठन और विशिष्ट अनुसंधान अध्ययन का मूल्यांकन, परिवर्धन, संशोधन तथा प्रस्तावों को पुन:अभिकल्पित करने के लिए योजना बनाना

  • मूल/अनुप्रयुक्त अनुसंधान का समर्थन करना और/या विज्ञान और प्रौद्योगिकी योजनाओं/ देश में ज्ञान बढ़ाने के उद्देश्य से जल संसाधनों और विज्ञान से संबंधित ज्ञान को बढ़ाने की आवश्यकता

  • समय-समय पर आवश्यकतानुसार केन्द्र और राज्य सरकारों को परामर्श तथा सलाहकार सेवाएँ प्रदान करना

  • जल संसाधनों में शोध निष्कर्षो का प्रसार और एक तकनीकी डाटा बेस का निर्माण

  • जल संसाधन विकास से जुड़े अनुसंधान क्षेत्र में प्रमुख राष्ट्रीय संगठन के रूप में तथा अनुसंधान श्रम शक्ति को प्रशिक्षण दिलाने में राज्यों और अन्य संस्थानों में जल संसाधन से जुड़ी अनुसंधान गतिविधियों को बढ़ावा /सहायता

1971 से यह संस्था आर्थिक और सामाजिक आयोग की एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र के लिए मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय प्रयोगशाला है। पड़ोसी, मध्य पूर्व तथा अफ्रीकी राष्ट्रों कीअनेक परियोजनाओं के लिए केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला ने सेवाएँ प्रदान की है ।

2.2.1 समितियाँ  

दो उच्च स्तरीय समितियाँ : 1976-77 के दौरान डॉ.एम.एस.स्वामीनाथन, महा निदेशक (आईसीएआर) की अध्यक्षता में पहली तथा 1998-99 के दौरान डॉ. एस.नरसिंहन, प्रोफेसर इमेरीटस, भारतीय औद्योगिकी संस्थान, मंुबई, की अध्यक्षता में दूसरी समिति गठित की गई। इन समितियों ने केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला के कार्यचालन का समीक्षण तथा विकास और प्रबंधन के बारें में सिफारिशें दीं । समितियों की सिफारिशों के कार्यन्वित होने पर लचीली पूरक योजना की श्ुरूवात, शासी परिषद की स्थापना और इस संगठन को जल संसाधन मंत्रालय के सीधे नियंत्रण में लाने के कारण इस संस्था का प्रभाव और भी बढ़ गया ।

3 उपसंहार 

केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला पिछले नौ दशकों के दौरान अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त संस्था बन गई है तथा यह दुनिया में अपनी तरह की संस्थाओं में से एक जो पानी के पूरे जीवन चक्र, उसके उद्गम से महासागर में मिलने तक तथा दूसरी ओर पानी के विभिन्न उपयोगों से लेकर पानी से संबंधित आपदाओं को निपटाने तक के सभी कार्य कर रही है। आज का जल प्र्रबंधन, निरंतर विकास और पर्यावरण मुद्दों पर केन्द्रित है और यह सकारात्मक परिवर्तन केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला की गतिविधियों में प्रतिबिंबित है। केन्द्रीय जल और विद्युत अनुसंधान शाला आज अनुसंधान द्वारा राष्ट्र की सेवा जो इस संस्था का आदर्श वाक्य भी है, में सदैव निष्ठापूर्वक कार्य करने में व्यस्त है ।